दिल्ली दिल से

विकल्प नहीं, गुस्सा नहीं, जनादेश का चुनाव, यह केजरीवाल की क्षमता का जनमत है ।

माननीय केजरीवाल जी,

सबसे पहले मैं आपको, आपकी और आप की कड़ी मेहनत का अद्भुत, अविश्वनीय और कई मायनो में दूसरी पार्टियों के लिए विध्यवंश का परिणाम आने के लिए बधाई देता हूँ । आपकी जीत दिल्ली की नहीं दिल की जीत है ।

यह वह परिणाम है जिसका बेसब्री से न केवल आप वरन पूरा देश ध्यान लगाए हुए था । सारे विरोधी पार्टियों के परे आपने अपने निजी प्रदर्शन का स्तर और आपकी पार्टियों के कार्यकर्ताओं ने अपने जूनून और मेहनत को इतना ऊपर कर दिया है कि लोगों ने इसे मोदी जी के सूनामी को रोकने वाला प्रदर्शन करार दिया और वैसे ही दिल्ली में सूनामी लाने का मुकुट आपके सर बाँध दिया ।

यह विषय को जन्म देता है कि क्या यह जनमत बीजेपी पे गुस्सा था, उनकी गलत नीतियों, उटपटांग बयानबाजी, चर्चों पर हमला, धर्मान्तरण की आग या कोई और बेहतर विकल्प नहीं था दिल्ली की जनता के सामने ? हो सकता है कि सभी कारण हों लेकिन सारे इतिहासकार यह जानते हैं की मुद्दा कोई भी किसी भी ३ वर्ष की पार्टी के लिए इस तरह का प्रदर्शन लगातार दो बार दोहराना सिर्फ इतफ़ाक ही नहीं हो सकता । इसके लिए उनकी अच्छी नीतिंयों, दिल्ली की परशानियो का समझने का जज्बा और देश के दिल में विकास की सही राजनीति को करने के विस्वास को भी जन समूह का समर्थन मिलता है ।

यह वाकई काबीले तारीफ है कि आपने न केवल विरोधियों के चक्रव्यूह को एक कुशल योद्धा अर्जुन के तरीके से तोड़ा वरन आपने एक उत्तम गुरु द्रोणाचार्य के भांति अपने आप पास एक ऐसे व्यूह की भी रचना की जिसको दूसरी सेना के सेनापती तोड़ भी न पाए  अन्दर जाने की बात करना तो वयर्थ ही है |

पूरे प्रचार अभियान में आरोप प्रत्यारोप और बहेतरीन, तजुर्बेकार, शातिर बीजेपी के विरोध में होते हुए भी चुनावी नतीजों का समीकरण कुछ इस तरीके से बदल रहा था कि शकुनी जैसा शातिर दिमाग रखने वालो ने भी यह कहना शुरू कर दिया की “रुक गया मोदी रथ, रुक गई सुनामी” यहां पर भी मै आपके निजी प्रशासनिक अनुभव की तारीफ करूँगा, न केवल आपने अपने विरोधियों को धवस्त किया बल्कि शोशल मीडिया, प्रपोगंडा, ढकोसलपान, वादे, सपने सबको मिलाकर एक इतना स्वादिष्ट अद्भुत रोमांचित करने वाला मिश्रण बनाया जो दिल्ली के हर वर्ग ने पसंद किया । इतना स्पष्ट बहुमत हर वर्ग के मदद के बिना असंभव ही था ।

आपने जैसा भी हो, बड़े उद्योयगपतियो का चीर हरण या आपकी जाती का प्रश्न सभी में संवाद और विचारों का आदान प्रदान बनाए रखा जो कांग्रेस  के आला अधिकारियों ने कभी भी नहीं किया विशेष तौर पे माननीय राहुल गांधी जी ने, वो हमेशा बैकफुट में खेलते रहे और संवादों के आदान प्रदान को मान्यता न देकर उन्होने अपने पक्ष में एक शून्यता जन्म दे दिया । जैसे उन्हें सिर्फ उन्हें ही नतीजा पहले से मालूम था ।

इसके बावजूद जनता ने आपको जो जवाबदारी दी है, उसका एहसास आपको हमेशा रखना पड़ेगा, क्योंकि हम भारतीय जितने भुल्कड़ हैं उतने हे स्वार्थी भी । वादाखिलाफी किसी की भी बर्दाश्त नहीं करेंगे । एक कहावत है कि भगवान अपने भक्तों का बोझ सह सकें, फूल माला पहन सके बिना किसी दवाब के इसलिए वो पत्थर के होते हैं ।

उम्मीद है हमारा प्यार, हमारा विश्वास, हमारा वोट और हमारी आशा आपको औरों की तरह पत्थर न बनने देगी । क्योंकि नाराज़ जनता वोट जरूर करती है ।

 

आकाश दिवेदी web hosting analysis

प्रधानमंत्री बनाम प्रधानमंत्री – देश के लिए या कुर्शी के लिए ?

“क्या मोदी की बजाए सुषमा प्रधानमंत्री की बेहतर उमीदवार हैं “
“नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी: यह विचारों की लड़ाई है”
“भाजापा बगैर नीतीश कुमार कैसे सहेजेंगे जनाधार “
भारत की स्वतंत्रता से आज तक, देश में कभी भी शायद प्रधानमंत्री बनाम प्रधानमंत्री युद्ध इतना रोचक नहीं हुआ था।
उस समय भी नहीं जब तीसरे  मोर्चे की सरकार का कोई वजूद भी नहीं हुआ करता था।  स्वतंत्रता से आज तक देश
में शासन करने की चाह रखने वाली सभी छोटी बड़ी पार्टियों ने अपनी महतवपूर्ण भूमिका निभाई है, भूमिका जो
लोगो को आज भी बाटे हुए है, जुड़ने नहीं दे रही है। और ये किसी भी पार्टी को नागवारा गुजरेगा, की अब अगर
उनके इतने सालों की मेहनत का सिला ये मिले की सभी लोग, फिर वो चाहे धर्मनिरपेछता की लक्ष्मन रेखा
को पार कर के आ रहे हो, उनके विचार एक हो जाएँ ।
यह वास्तव में बहुत ही मार्मिक और चिंतनीय प्रश्न है, चिंतनीय है तो विचाराधीन होना तो लाज़मी है।
की अगर सभी राजनैतिक पार्टियों का उद्देश्य भारत देश की अखंडता को बनाए रखते हुए उसे प्रगतिशील
होने वाले देश की गौरवान्ता प्रदान करनी है, तो इतना विरोध क्यों ? इतना वाद विवाद क्यों ?
किसलिए इतने सारे आरोप प्रत्यारोप ? क्यों इस देश की प्रगति में वक्तिगत आक्षेप ?
किसलिए किसी गलती के लिया क्षमा याचना से ज्यादा उसमे विरोध करने की दशा पैदा होती है ?
अगर वास्तव में सच्चाई यह है कि अपने देश के प्रति सभी पार्टियों का प्रयोजन एक ही है,
तो इस विरोधाभाष कि कोई जगह नहीं बनती है। और अगर यह विरोधाभाष  है तो यह सरासर गलत है,
कि सभी पार्टिया देश का भला चाहती है ।
यहाँ तो सिर्फ सिर्फ अपने सम्मान, वक्तिगत फ़ाएदे और चाहे हुए भोगविलासता को भोगने की दिलचस्पी
के लिए देश में शासन की जरूरत है।
अगर लक्ष्य एक है सबका तो इतने सारे रास्तो की जरूरत क्या है उस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए ?
पाट देना चाहिए उन सारे रास्तो को, पाटना ही पड़ेगा, खड़े होकर एक साथ चलने की जरूरत को महसूस करना
पड़ेगा देश को प्रगतिशील बनाने के लिए। बहुत सारे स्पीड ब्रेकर्स आएँगे, अड़चन होगी, विचारो में मेल भी नहीं
होगा कई मुद्दों में, कुछ में हो भी सकता है, सामजस्य बैठना पड़ेगा थोडा थोडा सभी को हो जाऐगा धीरे-धीरे।
आखिर बात जब देश की हो तो इतनी कुर्बानी का जस्बा तो दिखाना ही पड़ेगा, इस स्वतंत्र देश की बड़ी राजनैतिक
पार्टिया होने के नाते।
हम सभी सोचते बहुत हैं, बोलते भी बहुत हैं, लेकिन उसको महसूस बहुत कम करते हैं। बचपन में अपने बड़े बूढों
के मुंह से कई बार सुना है कि अगर ‘बड़े लोग जो बोलते हैं उसपे खुद अमल करने लगे तो हर घर स्वर्ग बन जाए।
यहां बड़े बूढों से मतलब बुद्धिजीवी और जावाबदार लोगो से है।
आज जरुरत है इस चिंतनीय स्थिति से बहार आने की, देश की व्यवस्था चरमराने के बहुत करीब है।
शायद दरार सब को नज़र आ रही है लेकिन उस दरार को न बढ़ने देने के लिए कोई भी अपना दवाब
उसमे से अपना पैर हटाकर कम नहीं करना चाहता, कर भी कैसे सकता है, ये तो एक हार के रूप में प्रदर्शित की जाने वाली बात हुई।
अगर सवाल प्रगतिवान और प्रतिभावान कहलाने वाले देश बनाने का है, तो वहाँ पे बुद्धिजीवी और जावाबदार लोगो को चाहे व्यक्तिगत हो या बड़ी और छोटी पार्टियों के समूह के रूप में हो इस संवेदनशील मामले पे एक राए बनानी होगी।
अगर यथार्थ में बात भारत देश के गौरव कि ही है, अंततः सब एक ढकोसला है।
Akash Dwivedi

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सचिन तेंदुलकर

Airtel only connected me with one of the Legendary Sachin Ramesh Tendulkar. Become a 1st caller from MP who talked with him. here is the video attached for his fans. My friends told me that I’m the luckiest person, I said yes I agree Today.

Receiving many calls from various places, and people are asking :-

कैसा लगा उनसे बात करके ?
मैंने बोला कैसा लगेगा उनसे बात करके ।

क्या बोल रहे थे वो ?
मैंने कहा वो बोलते कहा है, उनका तो सिर्फ बल्ला बोलता है।

क्या पूछा आपने ?
मैंने कहा क्या पूछूँगा मै उनसे ।

बस ये तो उस आत्मीय सुख की तरह था जिसे शब्दों की सीमओं में नहीं बाँधा जा सकता, सिर्फ महसूस किया जा सकता है।
जैसे की एक नवजात को अपनी माँ की गोद में, एक प्रेमी को अपनी प्रेमिका की बाहों में, एक संत को अद्यात्म में और एक भगवान को अपने भक्त को खुश देखने से मिलती है।

हाँ, मैंने भी भगवान से बात की, बस इतना ही कहना था|

 

Sachin Tendulkar Talking To Me

 

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